पेपर कवर या प्लास्टिक बुक कवर: स्कूल के लिए कौन सा बेहतर है?
स्कूल की किताब के लिए पेपर कवर लें या प्लास्टिक? चलने की अवधि, फटना, पानी गिरना, लुक, साल भर का खर्च, दोबारा इस्तेमाल और निपटान पर आमने-सामने की टेबल और साफ फैसला।

जो किताब पूरे साल रोज़ स्कूल जाती है, उसके लिए 50 माइक्रोन या उससे मोटा प्लास्टिक कवर बेहतर रहता है। यह स्कूल बैग की रगड़, गिरी हुई पानी की बोतल और बारिश, सब झेल लेता है, और आम तौर पर एक कवर पूरा साल निकाल देता है।
पेपर के भी अपने असली फायदे हैं, जो मैंने नीचे लिखे हैं। लेकिन रोज़ के स्कूल इस्तेमाल में पेपर ज़्यादातर पीछे रह जाता है।
एक बात पहले ही साफ कर दूँ: मैं निष्पक्ष नहीं हूँ। मेरी कंपनी, Jagannath Polymers Pvt Ltd (JPPL), प्लास्टिक कवर बनाती है, और हम पेपर कवर बिल्कुल नहीं बनाते। हम पेपर कवर क्यों नहीं बनाते, इस पर मैंने अलग से लिखा है। यहाँ मैंने पेपर की बात भी ईमानदारी से रखने की कोशिश की है। अगर आप डिस्ट्रीब्यूटर हैं, तो हर सीज़न में आपके रिटेलर्स से पेरेंट्स यही सवाल पूछते हैं। आप यह पेज उनके साथ बेझिझक शेयर कर सकते हैं।
पेपर vs प्लास्टिक बुक कवर: तुलना की टेबल
| बात | ब्राउन पेपर कवर | प्लास्टिक कवर (50 माइक्रोन या उससे ज़्यादा) |
|---|---|---|
| स्कूल की किताब पर कितना चलता है | साल में अक्सर दोबारा चढ़ाना पड़ता है, खासकर कोनों और स्पाइन की वजह से | फोल्ड ठीक से किए हों तो आम तौर पर पूरा साल चलता है |
| फटना | कोना गीला या घिसा कि फट जाता है | आम इस्तेमाल में आसानी से नहीं फटता, मोटी फिल्म और ज़्यादा टिकती है |
| पानी और गंदगी | पानी सोख लेता है और दाग छोड़ता है | पानी या गंदे हाथ का निशान कपड़े से पोंछ जाता है |
| लुक | सादा ब्राउन, पुराना स्कूल वाला लुक | ट्रांसपेरेंट, प्रिंटेड, फ्लोरोसेंट या प्लेन कलर |
| किताब दिखना | किताब का अपना कवर छिप जाता है | ट्रांसपेरेंट फिल्म से किताब का प्रिंटेड कवर दिखता है |
| इस पर लिखना | किसी भी पेन से आसानी से | नाम की लेबल या स्टिकर लगानी पड़ती है |
| साल भर में प्रति किताब खर्च | हर बार नई शीट खरीदनी और चढ़ानी पड़ती है | आम तौर पर साल भर के लिए एक ही कवर |
| दोबारा इस्तेमाल | दूसरे साल तक शायद ही बचता है | कभी-कभी उतारकर दोबारा लगाया जा सकता है |
| निपटान | फेंकने पर गल जाता है, पेपर कचरे में जाता है | फेंकने पर लंबे समय तक रहता है, सूखे कचरे में डालकर उठवाया जाता है |
ज़्यादा कौन चलता है, पेपर कवर या प्लास्टिक कवर?
प्लास्टिक, और वजह सीधी है। पेपर की कमज़ोर जगहें कोने और स्पाइन हैं। यही हिस्से रोज़ बैग और डेस्क से रगड़ खाते हैं, और नमी लगते ही पेपर नरम होकर फट जाता है।
प्लास्टिक कवर भी इन्हीं जगहों पर घिसता है, लेकिन बहुत धीरे, और नमी से नरम नहीं होता। यहाँ मोटाई का फर्क पड़ता है। मोटी फिल्म कोनों पर अपना आकार बेहतर रखती है, इसलिए जो किताब लंबी चलनी है, उसके लिए मैं 60 माइक्रोन या उससे ज़्यादा पसंद करता हूँ।
पानी, गंदगी और बारिश में क्या होता है?
यहीं पेपर सबसे साफ तौर पर हारता है।
गीला छाता, रिसती पानी की बोतल या कीचड़ वाला हाथ पेपर कवर पर हमेशा का दाग छोड़ देता है। प्लास्टिक पर बस पोंछ दीजिए।
इसका फैसला आप किसी भी स्कूल बैग में देख सकते हैं। जो परिवार ब्राउन पेपर कवर चुनते हैं, वे अक्सर साल निकालने के लिए उसके ऊपर ट्रांसपेरेंट प्लास्टिक कवर भी चढ़ा देते हैं। जब किताब आखिर में प्लास्टिक में ही जानी है, तो ब्राउन या ऑरेंज रंग का एक सिंथेटिक कवर यही काम एक ही परत में कर देता है। इसीलिए हम अपने कवर सिंथेटिक बनाते हैं।
कोई भी प्लास्टिक कवर पानी को पूरी तरह नहीं रोकता, और हम अपने कवर के लिए ऐसा दावा कभी नहीं करते। जो ऐसा दावा करे, उससे मैं सावधान रहूँगा। फोल्ड और खुले किनारों से पानी फिर भी अंदर जा सकता है। लेकिन कवर की सतह कुछ नहीं सोखती, और इससे नीचे किताब का अपना कवर बचा रहता है।
क्या साल भर में प्लास्टिक कवर पेपर से सस्ता पड़ता है?
मेरी राय में हाँ, और इसकी वजह है बार-बार बदलना। दोनों के दुकान वाले दाम शहर और मोटाई के हिसाब से बदलते हैं, इसलिए मैं कोई रेट नहीं बताऊँगा। खर्च एक ही गिनती से तय होता है: साल में एक ही किताब पर कितनी बार कवर चढ़ाया।
इस साल गिनकर देखिए। हर बार पेपर कवर फटता है, तो नई शीट खरीदनी पड़ती है और एक और शाम उसे चढ़ाने में जाती है। सेशन की शुरुआत में चढ़ाया प्लास्टिक कवर आम तौर पर सेशन के आखिर तक किताब पर ही रहता है।
मोटाई से भी हिसाब बदलता है। 50 माइक्रोन का कवर 70 माइक्रोन वाले से सस्ता है, लेकिन अगर वह साल भर नहीं चलता, तो वह सस्ता सौदा नहीं है।
पर्यावरण के लिए कौन सा बेहतर है?
टेबल की यह सबसे मुश्किल लाइन है, और मैं इसका एक लाइन में जवाब नहीं देना चाहता।
पेपर दोबारा उगने वाले स्रोत से आता है, और अगर पेपर कवर ज़मीन पर फेंक दिया जाए, तो वह प्लास्टिक से कहीं जल्दी गल जाता है। यह असली फायदा है। UN Environment Programme के अनुसार समुद्री कचरे में प्लास्टिक सबसे लंबे समय तक टिकने वाला हिस्सा है (UNEP, 23 नवंबर 2021)।
UNEP का यही लेख एक दूसरी बात भी कहता है, जिस पर लोग अक्सर ध्यान नहीं देते। उसके अनुसार दूसरे मटीरियल से बने सिंगल-यूज़ विकल्प "अपने आप में बेहतर नहीं हैं", और उदाहरण दिया गया है कि एक पेपर शॉपिंग बैग को एक सिंगल-यूज़ प्लास्टिक बैग से कम असर वाला बनने के लिए चार से आठ बार इस्तेमाल करना पड़ सकता है। वह स्टडी थैलों पर थी, बुक कवर पर नहीं। लेकिन सबक यहाँ भी लागू होता है: जो चीज़ ज़्यादा समय चले और कम बार बदलनी पड़े, वह फायदे में रहती है।
पेपर के कुछ खर्च ऐसे भी हैं जो आसानी से नज़र नहीं आते। पेपर बनाने और रिसाइकिल करने में बहुत पानी और बिजली लगती है, इसीलिए Central Pollution Control Board पल्प और पेपर मिलों के लिए वॉटर रिसाइक्लिंग चार्टर चलाता है। और जो पेपर कवर साल भर गीला और गंदा रहा हो, उसे रिसाइक्लिंग के लिए इकट्ठा करना ही मुश्किल होता है। कुल मिलाकर, पर्यावरण के हिसाब से भी हम इस काम के लिए प्लास्टिक फिल्म को बेहतर मानते हैं।
तो मेरी ईमानदार राय यह है।
जो प्लास्टिक कवर पूरे साल किताब पर रहे और फिर सूखे कचरे में जाए, वह ठीक विकल्प है। जो प्लास्टिक कवर सड़क पर फेंक दिया जाए, वह ठीक नहीं। रिसाइक्लिंग की बात करें तो International Journal of Environmental Science and Technology में छपी भारत में प्लास्टिक रिसाइक्लिंग पर 2022 की एक समीक्षा बताती है कि HDPE को आम तौर पर रिसाइकिल होने लायक माना जाता है। फिल्म बनाने वाले के तौर पर हमारा अनुभव है कि साफ PP फिल्म, जिससे हमारे ट्रांसपेरेंट और प्रिंटेड कवर बनते हैं, भारत में बड़े पैमाने पर इकट्ठा और रिसाइकिल होती है। रिसाइक्लर अक्सर PP की दूसरी चीज़ें छोड़ देते हैं। इसी समीक्षा में पाया गया कि भारत के रिप्रोसेसर PP और PE के लिए सबसे ज़्यादा तैयार हैं। जो भी हो, रिसाइक्लिंग वहीं होती है जहाँ कचरा इकट्ठा किया जाता है।
क्या भारत में प्लास्टिक बुक कवर कानूनी है?
हाँ, अगर वह काफी मोटा हो। जब Plastic Waste Management Rules, 2016 लागू हुए, तब Press Information Bureau की 18 मार्च 2016 की रिलीज़ में बताया गया कि इनमें प्लास्टिक शीट की न्यूनतम मोटाई 50 माइक्रोन तय की गई है। हमारा हर कवर 50 माइक्रोन या उससे मोटा है। 1 जुलाई 2022 से बैन हुई सिंगल-यूज़ चीज़ों में बुक कवर शामिल नहीं थे।
पेपर कवर कब चुनें?
इसकी अच्छी वजहें भी हैं, और मैं उनकी इज़्ज़त करता हूँ।
- स्कूल ब्राउन पेपर कवर माँगता है। स्कूल की बात मानिए।
- किताब कुछ ही हफ्तों के लिए चाहिए, जैसे कोई प्रोजेक्ट फाइल।
- बच्चा कवर को ड्रॉइंग और स्टिकर से सजाना चाहता है।
- आपको बस पेपर पसंद है और ज़रूरत पड़ने पर दोबारा कवर चढ़ाने में दिक्कत नहीं।
प्लास्टिक कब चुनें?
ये वो हालात हैं जिनमें हमें प्लास्टिक सबसे सही लगता है।
- किताब पूरे साल रोज़ स्कूल जाती है।
- आप किताब का प्रिंटेड कवर देखना चाहते हैं, जिसके लिए ट्रांसपेरेंट कवर चाहिए, जैसे हमारा प्लेन Clear डिज़ाइन।
- आप विषय के हिसाब से कलर कोडिंग चाहते हैं, जो फ्लोरोसेंट कवर जैसे Floura या प्लेन सिंथेटिक कवर से अच्छी तरह होती है।
- आप टर्म के बीच में बार-बार कवर चढ़ाने से थक चुके हैं।
अगर प्लास्टिक लेते हैं, तो 50 माइक्रोन को सबसे कम मानिए। जो किताब पूरा साल चलनी है, उसके लिए मैं 60 या 70 माइक्रोन लूँगा। हमारा सबसे ज़्यादा बिकने वाला कवर, Student JPPL, 70 माइक्रोन का है।
हमारे सिंथेटिक कवर 50 से 75 माइक्रोन तक आते हैं, और सिंथेटिक बुक कवर क्या होता है वाली गाइड में हर एक के बारे में बताया गया है।
एक-दो परिवारों के लिए छोटा पैक काफी है। हमारा सिस्टर ब्रांड PackSmith चार बॉक्स वाले रोल का सेट ऑनलाइन बेचता है। डिस्ट्रीब्यूटर्स और होलसेल डीलर्स के लिए हमारी पूरी रेंज नोटबुक कवर पेज पर है।
खरीदार अक्सर पूछते हैं
क्या भारत के स्कूलों में प्लास्टिक बुक कवर की इजाज़त है?
50 माइक्रोन या उससे मोटे प्लास्टिक बुक कवर प्लास्टिक शीट के राष्ट्रीय न्यूनतम मानक पर खरे उतरते हैं, और 2022 की सिंगल-यूज़ प्लास्टिक बैन लिस्ट में बुक कवर शामिल नहीं थे। कुछ स्कूल अपने नियम खुद तय करते हैं, इसलिए अगर स्कूल की लिस्ट में कुछ खास लिखा है तो वही मानें।
कौन सा प्लास्टिक कवर सबसे ज़्यादा चलता है?
आम तौर पर मोटी फिल्म कोनों और किनारे (स्पाइन) पर ज़्यादा टिकती है। हमारी रेंज में प्लेन Student JPPL कवर 70 माइक्रोन का है और एम्बॉस्ड Unique कवर 75 माइक्रोन का, जो हमारा सबसे मोटा कवर है।
क्या प्लास्टिक बुक कवर अगले साल दोबारा इस्तेमाल हो सकता है?
कभी-कभी। अगर कवर बिना फटे उतर जाए, तो उसी साइज़ की किताब पर चढ़ सकता है। असल में ज़्यादातर कवर किताब पर ही रहते हैं, इसलिए बड़ी बचत यह है कि साल के बीच में उसी किताब पर दोबारा कवर नहीं चढ़ाना पड़ता।
पुराने प्लास्टिक कवर का क्या करें?
इसे सूखे कचरे में डालें, नाली या खुली ज़मीन पर नहीं, और कभी जलाएँ नहीं। अगर आपके शहर में सूखा कचरा अलग से उठाया जाता है, तो इसके रिसाइक्लर तक पहुँचने की संभावना रहती है।

